भगवान श्रीकृष्ण द्वारा गोवर्धन धारण और इंद्र के मान-मर्दन की लीला
ब्रज में दीपावली का समय था। नंदगाँव और आसपास के गांवों में उत्सव का वातावरण था। ब्रजवासी एक बड़े धार्मिक आयोजन की तैयारी कर रहे थे। अनेक प्रकार के पकवान और मिठाइयाँ तैयार की जा रही थीं। नंदबाबा की आज्ञा से इंद्रध्वज भी स्थापित किया गया था। यह सब देखकर बालक श्रीकृष्ण ने नंदबाबा से पूछा कि इतनी तैयारियाँ किस उत्सव के लिए हो रही हैं।
नंदबाबा ने बताया कि ब्रजवासी प्रतिवर्ष इंद्रदेव की पूजा करते हैं। उनका विश्वास था कि इंद्र वर्षा के देवता हैं और उनकी कृपा से वर्षा होगी तो खेतों में हरियाली आएगी, गायों के लिए चारा मिलेगा और ब्रज की जीवन-व्यवस्था चलती रहेगी।
श्रीकृष्ण ने इस बात पर विचार किया और नंदबाबा से कहा कि ब्रजवासियों का वास्तविक जीवन तो गायों, गोवर्धन पर्वत और ब्राह्मणों से जुड़ा है। गायों को गोवर्धन से घास, जल और दूसरी आवश्यक वस्तुएँ मिलती हैं। इसलिए हमें उस गोवर्धन का सम्मान और पूजन करना चाहिए, जो प्रत्यक्ष रूप से ब्रज की गायों और ग्वालों का पालन करता है।
कृष्ण ने यह भी समझाया कि जीव को उसके कर्मों के अनुसार सुख-दुःख और जीवन के परिणाम प्राप्त होते हैं। इसलिए ब्रजवासियों को अपने कर्तव्य और अपने वास्तविक आश्रय को पहचानना चाहिए। उन्होंने नंदबाबा से आग्रह किया कि इंद्र की पूजा के लिए जो सामग्री एकत्र की गई है, उसी से गायों, ब्राह्मणों और गिरिराज गोवर्धन का महोत्सव किया जाए।
नंदबाबा और ब्रजवासियों ने कृष्ण की बात स्वीकार कर ली।
गिरिराज पूजा का महोत्सव
पूरा ब्रज गिरिराज की ओर चल पड़ा। स्त्री-पुरुष, बालक और वृद्ध सभी उत्साह में थे। चारों ओर भगवान कृष्ण और गिरिराज महाराज के जयकारे सुनाई दे रहे थे।
गोवर्धन की विधि-विधान से पूजा की गई। तरह-तरह के व्यंजन और मिठाइयाँ अर्पित की गईं। देखते ही देखते भोजन का विशाल पर्वत जैसा ढेर तैयार हो गया। इसी प्रसंग को पुस्तक अन्नकूट परंपरा के आरंभ से जोड़ती है।
गोवर्धन को ब्रजवासियों ने इसलिए अपना आराध्य माना क्योंकि वह उनकी गायों और ग्वालबालों के जीवन का आधार था। वहाँ जल के स्रोत थे, हरी घास थी, फल-फूल और वनस्पतियाँ थीं तथा गायों और ग्वालों के लिए आश्रय के अनेक स्थान थे। इसी कारण ‘गोवर्धन’ नाम को गो-धन को बढ़ाने वाला अर्थ भी दिया गया है।
पूजा के बाद ब्रजवासियों ने गिरिराज की परिक्रमा की और आनंदपूर्वक उत्सव मनाया।
लेकिन देवलोक में जब इंद्र को यह समाचार मिला कि ब्रजवासियों ने उनका यज्ञ छोड़कर गोवर्धन की पूजा की है, तो वे अत्यंत क्रोधित हो उठे।
इंद्र का प्रकोप
इंद्र को अपने पद और सामर्थ्य का अभिमान था। उन्हें लगा कि ब्रजवासियों ने उनका अपमान किया है। क्रोध में उन्होंने भयंकर वर्षा करने वाले मेघों को आदेश दिया कि वे पूरे ब्रज को जलमग्न कर दें और वहाँ की गायों तथा संपत्ति को नष्ट कर दें।
कुछ ही समय में ब्रज का आकाश घने काले बादलों से भर गया। तेज हवाएँ चलने लगीं। बिजली चमकने लगी और भयंकर गर्जना के साथ मूसलाधार वर्षा शुरू हो गई। वर्षा के साथ बड़े-बड़े ओले भी गिरने लगे।
ब्रजवासी भय से व्याकुल हो उठे। गायें और बछड़े परेशान हो गए। स्त्रियाँ, बच्चे और वृद्ध सहायता के लिए कृष्ण की ओर देखने लगे।
नंदबाबा को चिंता हुई कि कहीं कृष्ण की बात मानकर इंद्र-यज्ञ रोकना बहुत बड़ी भूल तो नहीं हो गई। लेकिन कृष्ण ने ब्रजवासियों को भयभीत न होने का आश्वासन दिया।
कृष्ण बने गिरिधारी
ब्रजवासियों की रक्षा के लिए श्रीकृष्ण ने अपनी अद्भुत शक्ति प्रकट की। उन्होंने गोवर्धन पर्वत को अपनी कनिष्ठिका पर उठा लिया।
उन्होंने ब्रजवासियों से कहा कि सभी लोग अपनी गायों और परिवारों के साथ गोवर्धन के नीचे आ जाएँ। विशाल पर्वत एक छत्र की तरह पूरे ब्रज की रक्षा करने लगा।
ब्रज के लोग आश्चर्य से कृष्ण को देखते रहे। एक ओर आकाश से लगातार वर्षा हो रही थी और दूसरी ओर छोटा-सा कृष्ण बालक अपनी उंगली पर पूरे गोवर्धन को धारण किए हुए था।
सात दिनों तक वर्षा होती रही, लेकिन गोवर्धन के नीचे रहने वाले ब्रजवासियों और उनकी गायों तक वर्षा की एक बूंद भी नहीं पहुँची।
सात दिनों का रहस्य
पुस्तक में ब्रह्मवैवर्त पुराण के आधार पर इस सात दिन की लीला का एक विशेष आध्यात्मिक अर्थ बताया गया है। कथा के अनुसार नंदबाबा के मन में भगवान के अतिरिक्त कई बाहरी आश्रयों पर विश्वास था। वर्षा के सात दिनों में वे आश्रय क्रमशः समाप्त होते गए।
पहले देवताओं पर निर्भरता का भाव टूटा। उसके बाद ऋषियों, समाज के बड़े लोगों, दूसरे लोगों की सहायता, पूर्वजों की कृपा, लोक-लाज और अंततः अपने स्वयं के सामर्थ्य पर भरोसा भी समाप्त हो गया।
सातवें दिन नंदबाबा के हृदय में यह विश्वास पूर्ण रूप से स्थापित हो गया कि—
कृष्ण के अतिरिक्त ब्रज की रक्षा करने वाला कोई नहीं है।
और जब यह पूर्ण शरणागति हुई, तब इंद्र का प्रचंड वर्षा-प्रकोप समाप्त हो गया। बादल छँट गए और ब्रज पर फिर से शांति छा गई।
इंद्र का अहंकार समाप्त
इंद्र को अपनी शक्ति की सीमा समझ में आ गई। वे जान गए कि उनका क्रोध और सामर्थ्य उस परम शक्ति के सामने कुछ भी नहीं है, जिसने एक बालक के रूप में गोवर्धन को धारण कर लिया था।
श्रीकृष्ण ने गोवर्धन को पुनः उसके स्थान पर स्थापित कर दिया और एक शिला पर विराजमान हो गए।
इंद्र अपने वाहन ऐरावत और गाय सुरभि के साथ कृष्ण के पास पहुँचे। उनका अहंकार समाप्त हो चुका था। उन्होंने भगवान के चरणों में अपना मस्तक रख दिया और अपराध के लिए क्षमा माँगी। कृष्ण ने भी करुणापूर्वक इंद्र को क्षमा कर दिया।
इसके बाद सुरभि ने अपने दूध से कृष्ण का अभिषेक किया। ऐरावत स्वर्गीय गंगा का जल लेकर आया। देवताओं और ऋषियों की उपस्थिति में इंद्र ने कृष्ण का अभिषेक किया और उन्हें ‘गोविंद’ नाम से संबोधित किया—गौओं के रक्षक और पालनकर्ता के रूप में।
श्रीकृष्ण ने इंद्र को समझाया कि पद, शक्ति और ऐश्वर्य मिलने पर मनुष्य को अहंकार में नहीं डूबना चाहिए। अपने अधिकार की सीमा में रहकर कर्तव्य करना ही उचित है।
इस प्रकार गोवर्धन लीला में श्रीकृष्ण ने ब्रजवासियों की रक्षा की, इंद्र के अहंकार को दूर किया और यह संदेश दिया कि बाहरी शक्ति पर घमंड करने के बजाय भगवान की शरण और अपने धर्म-कर्म में विश्वास रखना चाहिए।
इसीलिए ब्रज में आज भी श्रद्धा से पुकारा जाता है—
श्री गिरिराज महाराज की जय!
गोवर्धननाथ महाराज की जय!
गिरिराज महाराज की जय!