गंगा अवतरण की कथा हिंदू धर्म की सबसे पवित्र कथाओं में से एक है। यह कथा राजा भगीरथ की तपस्या और भगवान शिव की करुणा का वर्णन करती है।
प्राचीन काल में राजा सगर के साठ हजार पुत्र कपिल मुनि के श्राप से भस्म हो गए थे। उनकी आत्माओं की मुक्ति तभी संभव थी जब स्वर्ग की पवित्र गंगा पृथ्वी पर आकर उनके अवशेषों को स्पर्श करे।
राजा भगीरथ ने अपने पूर्वजों की मुक्ति के लिए कठोर तपस्या की। वर्षों की तपस्या के बाद माता गंगा प्रकट हुईं और पृथ्वी पर आने के लिए तैयार हो गईं।
लेकिन गंगा का वेग इतना प्रबल था कि यदि वे सीधे पृथ्वी पर उतरतीं तो पूरी पृथ्वी नष्ट हो सकती थी।
तब भगीरथ ने भगवान शिव की आराधना की। शिव जी प्रसन्न हुए और उन्होंने गंगा को अपनी जटाओं में धारण करने का निर्णय लिया।
जब गंगा स्वर्ग से उतरीं तो शिव जी ने उन्हें अपनी जटाओं में रोक लिया। बाद में उन्होंने धीरे-धीरे गंगा की धाराओं को पृथ्वी पर प्रवाहित किया।
गंगा भगीरथ के पीछे-पीछे चलती हुई उस स्थान तक पहुंची जहां उनके पूर्वजों की अस्थियां थीं। गंगा जल के स्पर्श से उन्हें मोक्ष प्राप्त हुआ।
इसी कारण गंगा को “भागीरथी” भी कहा जाता है।
निस्वार्थ उद्देश्य के लिए किया गया प्रयास कभी व्यर्थ नहीं जाता। दृढ़ संकल्प, तपस्या और धैर्य से बड़े से बड़ा लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है।