श्री बाँके बिहारीजी महाराज के प्राकट्य की कथा
निधिवन की भक्ति, स्वामी हरिदासजी की साधना और बिहारीजी के दिव्य प्राकट्य की कथा
वृंदावन की पावन धरती को श्रीराधा-कृष्ण की दिव्य लीलाओं की भूमि माना जाता है। यहाँ अनेक ऐसे मंदिर और ठाकुर-विग्रह हैं, जिनकी परंपरा महान संतों और भक्तों से जुड़ी हुई है। वृंदावन के इन प्रमुख विग्रहों में श्री बाँके बिहारीजी महाराज का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। पुस्तक के अनुसार बाँके बिहारीजी की सेवा-परंपरा महान संत स्वामी हरिदासजी से जुड़ी हुई है।
स्वामी हरिदासजी का निधिवन से प्रेम
स्वामी हरिदासजी को राधारानी की अंतरंग सखी ललिता सखी का स्वरूप माना गया है। उनका जीवन श्रीराधा-कृष्ण की भक्ति और सेवा में समर्पित था। यद्यपि संपूर्ण वृंदावन उनके लिए पूजनीय था, लेकिन निधिवन से उनका विशेष अनुराग था। वे प्रतिदिन निधिवन को प्रणाम करने जाते। वहाँ की लताओं, वृक्षों और वातावरण को देखते ही वे गहरे आध्यात्मिक भाव में डूब जाते।
कभी उनकी आँखों से प्रेम के आँसू बहने लगते, कभी वे मधुर स्वर में गाने लगते और कभी उनके चेहरे पर ऐसी प्रसन्नता दिखाई देती मानो उन्होंने कोई अत्यंत आनंददायक दृश्य देख लिया हो।
उनके शिष्य प्रतिदिन यह सब देखते, लेकिन इसका रहस्य समझ नहीं पाते थे। अंततः उनकी जिज्ञासा इतनी बढ़ गई कि उन्होंने स्वामीजी से पूछ ही लिया कि निधिवन में ऐसा क्या है, जिसके दर्शन मात्र से वे इस प्रकार भाव-विभोर हो जाते हैं।
शिष्यों को मिला निधिवन का दिव्य दर्शन
स्वामी हरिदासजी ने अपने शिष्यों पर कृपा की और उन्हें निधिवन का ऐसा दर्शन कराया जिसे सामान्य आँखों से देखना संभव नहीं था।
शिष्यों ने वहाँ श्रीराधा-कृष्ण की दिव्य लीला का अनुभव किया। उस अलौकिक दृश्य ने उनके मन और चेतना को पूरी तरह बदल दिया। वे बाहरी संसार को भूलकर आनंद और प्रेम की अनुभूति में डूब गए।
यह अनुभव उनके लिए जीवन की सबसे बड़ी आध्यात्मिक घटनाओं में से एक बन गया।
स्वर्ण जलपात्र की घटना
स्वामी हरिदासजी ने अपने वरिष्ठ शिष्य श्री विट्ठल विपुल देवजी को उस दिव्य लीला-स्थल से जलपात्र लाने के लिए कहा। विट्ठल विपुल देवजी वहाँ से एक स्वर्ण जलपात्र लेकर लौटे। स्वामीजी चाहते थे कि शिष्यों को यह विश्वास हो जाए कि उन्होंने जो देखा था वह केवल मन की कल्पना नहीं थी, बल्कि वास्तविक दिव्य अनुभूति थी। लेकिन जैसे ही विट्ठल विपुल देवजी उस स्थान से बाहर निकले और पीछे मुड़कर देखा, वहाँ वह लीला-स्थल दिखाई नहीं दिया। श्रीराधा-कृष्ण भी सामान्य दृष्टि से ओझल हो चुके थे। इस अद्भुत घटना के बाद स्वामी हरिदासजी प्रेम में डूबकर श्रीराधा-कृष्ण की स्तुति करने लगे।
विट्ठल विपुल देवजी की मनोकामना
उस दिव्य दर्शन ने विट्ठल विपुल देवजी के मन में श्रीराधा-कृष्ण की लीलाओं के दर्शन की गहरी लालसा उत्पन्न कर दी। उन्होंने अपने गुरु स्वामी हरिदासजी से प्रार्थना की कि उन्हें प्रतिदिन ऐसी दिव्य लीला के दर्शन प्राप्त हों। भक्त की इस इच्छा को भगवान ने स्वीकार किया। भगवान ने शीघ्र ही ऐसी कृपा की कि उसी निधिवन में श्रीकृष्ण बिहारीजी के स्वरूप में प्रकट हुए।
विहार पंचमी पर हुआ बिहारीजी का प्राकट्य
यह घटना मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी से जुड़ी हुई है, जो सामान्यतः दिसंबर-जनवरी के समय आती है। इसी दिन निधिवन के उसी पावन कुंज में श्री बिहारीजी, अर्थात श्रीकृष्ण, भक्तों पर कृपा करने के लिए प्रकट हुए। इस तिथि को विहार पंचमी के नाम से भी जाना जाता है। स्वामी हरिदासजी के निर्देश पर श्री विट्ठल विपुल देवजी ने प्रेमपूर्वक बिहारीजी को अपनी गोद में उठाया और निधिवन से बाहर लाए। बिहारीजी के प्राकट्य का समाचार फैलते ही स्वामी हरिदासजी की ख्याति भी चारों ओर फैल गई।
क्यों कहलाते हैं बाँके बिहारी?
श्री बिहारीजी के नाम में ही उनके स्वरूप की विशेषता छिपी हुई है। पुस्तक में ‘बाँका’ शब्द के दो अर्थ बताए गए हैं—सुंदर ढंग से मुड़ा हुआ और सुंदर। बिहारीजी का शरीर तीन स्थानों पर मनोहारी ढंग से झुका हुआ बताया गया है—
- घुटनों के पास
- कमर के पास
- गर्दन के पास
इस त्रिभंगी मुद्रा के कारण उनका स्वरूप अत्यंत आकर्षक और मनमोहक दिखाई देता है। इसी मनोहर स्वरूप के कारण भक्त उन्हें प्रेम से बाँके बिहारीजी महाराज कहते हैं।
बिहारीजी की सेवा में समर्पित स्वामी हरिदासजी
बिहारीजी के प्राकट्य के बाद स्वामी हरिदासजी की दैनिक साधना और सेवा और भी अधिक प्रेममयी हो गई।
वे अपने ठाकुरजी के लिए तरह-तरह के स्वादिष्ट व्यंजन तैयार करवाते और प्रेम से भोग लगाते। इसके साथ वे मधुर संगीत के माध्यम से श्रीराधा-कृष्ण का गुणगान करते थे।
ठाकुरजी को अर्पित किए गए भोग का शेष प्रसाद वे अपने तक सीमित नहीं रखते थे। वे उसे मोरों, बंदरों, मछलियों और अन्य जीवों को भी खिलाते थे।
स्वयं अपने लिए उनका जीवन अत्यंत सादा था। पुस्तक में उल्लेख है कि वे जीवन-निर्वाह के लिए केवल थोड़े से भुने हुए चने ग्रहण करते थे।
उनका जीवन मानो यही संदेश देता था कि भक्त के लिए सबसे बड़ा सुख ठाकुरजी की सेवा है।
जब पर्वतपुरी ने स्वामी हरिदासजी की परीक्षा ली
स्वामी हरिदासजी की प्रसिद्धि बढ़ने लगी तो अनेक संत, साधु, योगी और विद्वान उनके पास आने लगे।
इसी क्रम में पर्वतपुरी नामक एक संन्यासी भी स्वामीजी की आध्यात्मिक स्थिति को परखने आया।
पर्वतपुरी के पास ऐसी योग-सिद्धियाँ थीं जिनसे वह अलग-अलग रूप धारण कर सकता था। उसने स्वामीजी को प्रभावित करने के लिए कभी सिंह तो कभी सर्प का रूप धारण किया।
लेकिन स्वामी हरिदासजी बिल्कुल विचलित नहीं हुए।
उन्होंने समझ लिया कि यह पर्वतपुरी ही है और उसकी सिद्धियाँ उसके आध्यात्मिक विकास के बजाय अहंकार का कारण बन रही हैं। स्वामीजी के अनुसार ऐसी शक्तियाँ तभी सार्थक हैं जब उनका उपयोग आध्यात्मिक उन्नति में हो।
मोर बनकर आया पर्वतपुरी
पर्वतपुरी ने एक दिन फिर स्वामीजी की परीक्षा लेने की ठानी।
इस बार उसने मोर का रूप धारण किया और स्वामी हरिदासजी के पास प्रसाद पाने के लिए आ गया।
स्वामीजी उसकी वास्तविक पहचान समझ गए। उन्होंने सहज भाव से उस नए मोर की ओर देखकर संकेत किया कि आज एक नया मोर आया है।
पर्वतपुरी समझ गया कि उसकी सिद्धि स्वामीजी की भक्ति के सामने कुछ भी नहीं है।
उसका अहंकार टूट गया। उसे अपनी भूल का गहरा पश्चाताप हुआ और वह स्वामीजी के चरणों में झुककर क्षमा माँगने लगा।
स्वामी हरिदासजी ने उसके अपराध को लेकर कठोरता नहीं दिखाई। अपनी करुणा से उसे स्वीकार किया और उसे ‘प्रकाश दास’ नाम दिया।
यह प्रसंग भक्ति की शक्ति को उजागर करता है—योग-सिद्धि से बड़ा साधन भगवान के प्रति सच्चा प्रेम है।
दयाराम ब्राह्मण का परिवर्तन
स्वामी हरिदासजी की कृपा से केवल योगी और साधु ही प्रभावित नहीं हुए।
पुस्तक में दयाराम नामक सारस्वत ब्राह्मण का भी प्रसंग मिलता है। वह विद्वान परिवार में जन्म लेने के बावजूद पारसमणि के मोह में फँसा हुआ था।
स्वामीजी ने उसके भीतर की इस आसक्ति को दूर किया और उसे वास्तविक आध्यात्मिक संपत्ति की ओर लगाया।
उन्होंने उसे श्रीराधा-कृष्ण के नाम, स्वरूप, लीलाओं और गुणगान की ओर प्रवृत्त किया।
इस प्रकार स्वामीजी की दृष्टि में वास्तविक धन वह नहीं था जो संसार में संग्रह किया जाए, बल्कि वह था जो मनुष्य को भगवान के निकट ले जाए।
राजा-महाराजा और संत भी आते थे दर्शन के लिए
बिहारीजी के प्राकट्य और स्वामी हरिदासजी की भक्ति की चर्चा दूर-दूर तक फैल गई।
राजा, संगीतज्ञ, योगी, संत और साधु उनके दर्शन तथा सत्संग के लिए आने लगे।
मान्यता है की अकबर भी स्वामी हरिदासजी का संगीत सुनने आया था।
स्वामीजी की प्रतिष्ठा का आधार सांसारिक पद या वैभव नहीं था, बल्कि उनकी साधना और श्रीराधा-कृष्ण के प्रति उनकी अनन्य भक्ति थी।
स्वामी हरिदासजी का अद्भुत संगीत
स्वामी हरिदासजी भारतीय भक्ति और संगीत परंपरा के महान संतों में वर्णित हैं। उनका संगीत इतना प्रभावशाली था कि संगीत और नृत्य में दक्ष गंधर्व भी उसकी बराबरी नहीं कर सकते थे। लेकिन उनके संगीत की सबसे बड़ी विशेषता उनकी कला नहीं, बल्कि उसका उद्देश्य था। वे किसी राजा, धनवान या सामान्य व्यक्ति को प्रसन्न करने के लिए नहीं गाते थे। उनका गायन श्रीराधा-कृष्ण की प्रसन्नता के लिए था।
तानसेन भी थे स्वामी हरिदासजी के शिष्य
स्वामी हरिदासजी की संगीत साधना की प्रसिद्धि इतनी व्यापक थी कि पुस्तक में प्रसिद्ध संगीतज्ञ तानसेन को उनका शिष्य बताया गया है।
आगे तानसेन से बैजू बावरा ने भी संगीत की शिक्षा प्राप्त की।
इस प्रकार स्वामी हरिदासजी की संगीत साधना ने भक्ति के साथ-साथ भारतीय संगीत की परंपरा पर भी प्रभाव डाला।
‘केलिमाल’ और स्वामी हरिदासजी की साहित्य साधना
स्वामी हरिदासजी संगीत के साथ-साथ कविता और साहित्य में भी सिद्धहस्त थे। 110 पदों का ‘केलिमाल’ नामक संग्रह तैयार किया।
वे वृंदावन के निकुंजों में श्री राधा-कृष्ण की लीलाओं की उपासना की परंपरा को आगे बढ़ाने वाले प्रमुख संतों में माने गए हैं। उनकी परंपरा को सखी या हरिदास समुदाय के नाम से भी जाना गया।
विट्ठल विपुल देवजी और आगे की परंपरा
बाँके बिहारीजी के प्राकट्य से जुड़े श्री विट्ठल विपुल देवजी स्वयं भी इस भक्ति परंपरा में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। श्री विट्ठल विपुल देवजी ने श्री बिहारीन देवजी को अपना शिष्य बनाया।
इस प्रकार बाँके बिहारीजी की भक्ति केवल एक घटना तक सीमित नहीं रही, बल्कि गुरु-शिष्य परंपरा के माध्यम से आगे बढ़ती रही।
बाँके बिहारीजी की कथा का आध्यात्मिक संदेश
श्री बाँके बिहारीजी के प्राकट्य की इस कथा में सबसे प्रमुख भाव अनन्य भक्ति और भगवान के प्रति पूर्ण समर्पण का है।
स्वामी हरिदासजी ने संसार से कुछ माँगने के लिए भक्ति नहीं की। उनका मन श्रीराधा-कृष्ण की सेवा में लगा था। निधिवन के प्रति उनका प्रेम, संगीत को भगवान की सेवा बनाना, अपने लिए अत्यंत सीमित आवश्यकताएँ रखना और दूसरों को भी भगवान की भक्ति की ओर प्रेरित करना उनके जीवन की प्रमुख विशेषताएँ थीं।
विट्ठल विपुल देवजी की दिव्य दर्शन की लालसा और स्वामी हरिदासजी की अनन्य साधना के संदर्भ में बिहारीजी का निधिवन में प्राकट्य भक्त और भगवान के बीच प्रेमपूर्ण संबंध का प्रतीक बन जाता है।
निधिवन की भूमि, स्वामी हरिदासजी की साधना और श्री बाँके बिहारीजी का प्राकट्य—ये तीनों मिलकर वृंदावन की उस भक्तिमयी परंपरा का निर्माण करते हैं, जिसमें भगवान को पाने का मार्ग केवल ज्ञान या शक्ति नहीं, बल्कि प्रेम, सेवा और समर्पण माना गया है।
आज भी जब भक्त वृंदावन में बाँके बिहारीजी के दर्शन की कामना करता है, तो उसके हृदय में यही भावना रहती है कि ठाकुरजी की एक झलक मिल जाए और मन श्रीराधा-कृष्ण के प्रेम में डूब जाए।
जय श्री बाँके बिहारी लाल की।
राधे राधे।